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भोजपुरी के विकास खातिर रउरा सभे आगे आई , भोजपुरी के गँवारू भाषा जनि बनाईं

  (शैलेन्द्र प्रताप शाही, प्रबंध संपादक  )

भोजपुरिया बयार मासिक पत्रिका के माध्यम से हमनी के लगतार तिसरका अंक रउरा लोग के बीच में लेके आवत में हमनी के पूरा टीम सहित हजारो पाठक लोग के बड़ी ख़ुशी हो रहल बा . ऐह ख़ुशी के साथे कुछ दुःखवाला बात बा .आज कुछ लोग तनी ज्यादा हाई – फाई हो गईल बा . ओकरा आपन मात्रभाषा भोजपुरी बोले में भी बड़ा शर्म महसूस हो रहल बा . हमार अईसन लोग से हाथ जोड़ के निहोरा बा की रउरा लोग हमनी के मात्रभाषा भोजपुरी के ग्वाररन के भाषा कह के अपना भोजपुरी के अपमानित मत करी लोग . भोजपुरी भाषा ही ना बल्कि एगो संस्कृति भी हवे . एतना मजबूत कवनो संस्कृति नईखे . अपना सभ्यता संस्कृति के बचावे खातिर भोजपुरी के रउरा लोग मिलजुल के आगे बढ़ाई लोग . हमनी के अपना महतारी आ बाप के बहुत बड़का करजा के रूप में भोजपुरी भाषा भी बा . हमनी के जन्म के बाद से सबसे पहिले भोजपुरिए बोले के सिखले बानी जा .ओकरा बाद से हिंदी तब अंग्रेजी औरो दोसर भाषा सिखले बानी जा . एहिसे हमार रउरा लोग से निहोरा बा की भोजपुरी के आगे बढ़ावे खातिर रउरा लोग आपन योगदान दी लोग . रउरा कही रही बाकिर भोजपुरी में बोली , भोजपुरी में लिखी , भोजपुरी में पढ़ी तब जाके हमनी के भाषा के मजबूती मिली  . जब हमनी के टीम के लोग पत्रिका के वार्षिक सदस्यता बनावे खातिर अपना समाज के निमन ओहदा पर पढ़ल लिखल लोग के लगे गईल तब कुछ लोग इहे कहल कि भाग भोजपुरी पढ़ले का होई इ त ग्वारन के भाषा हवे . भोजपुरी के गँवारू भाषा बनावे प उतारू लोगनो से हमरा बहुत शिकायत बा. बोली से भाषा तक पहुँचे में भाषा के (मोटामोटी) एकरूपता काम आवेले आ ओकरे कारन मानकत्व मिलेला, हालाकि अंतर्राष्ट्रिओ स्तर का भसन में ई गुन नइखे मिलत. बाकिर, एह दौरान जवन बात सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होले ऊ ह “भाषा के स्तरीयता का प्रति सचेष्टता”. लगातार लागल रहे के परी एह पुनीत कार्य में, एकरा सङहीं समय का सङहूँ चलेके परी. वक्त का प्रवाह से भाषा का प्रवाह के अलग नइखे कइल जा सकत. लोकप्रिय आ सहज आगत देशी-विदेशी शब्दन के अपनावलो ओतने जरूरी बाटे ना त भाषा से सहजता गायब हो जाई. समय का साथ चले में कई गो चीजन के छूटि जाए के खतरो भी रहेला बाकिर ओतना मोह त बाद क के चलहीं के परी. एहसे सहज बोलचाल में आ रहल अलग भसन का शब्दन पर नाक-भौं मति सिकोरीं, भाषा के गँवारू बनावे खातिर कोपभवन में मति चलि जाईं. जब ढेर लिखाए आ बोलाए लागी त कई गो शब्द आपन रूप बदलि दीहें स. इंतजार कइल जाउ. हमनी के ज्यादा से ज्यादा ध्यान लिखे आ बोले पर रहेके चाहीं.

भोजपुरी दू डेग आगे त हिंदी दू डेग पाछे

हिंदी के कुछ तथाकथित विद्वान एह घरी भोजपुरी पर आपन-आपन ब्रह्मास्त्र चलावे में लागल बा लोग. ऊहन लोग में ई डर समा गइल बा कि भोजपुरी के जहाँ संविधान का आठवीं सूची में जगह मिलल कि हिंदी सतनास के गइलि. उहाँ सभ के गणित विषय ढेर प्रिय हो गइल बा. बड़ा नीमन फर्मूला निकलले बानी सभे – “भोजपुरी दू डेग आगे त हिंदी दू डेग पाछे.” अतने ना, उहाँ सभ भोजपुरी के ‘बोली’ बतावहुँ पर तनी ढेरे अध्ययन क लेले बानी.अब उहाँ सभ के के बताओ कि जवन आजु मानक हिंदी बिया, तवन पहिले ‘खड़ी बोली’ रहे आ हाँ खा तक सधारन जनता में ‘खड़ी हिंदी’ का नाँव से जानल जात रहे. भारतेंदुओ युग में गद्य के भलहीं शुरुआत हो गइल रहे बाकिर कविता त काफी बाद में, ऊहो टुक-टाँइ टुक-टाँइ लिखाए शुरू भइल. हिंदी के ई सरूप बनल द्विवेदी युग में, जबकि ओकरा पहिले तुलसी के अवधी, सूर के ब्रजभाषा अउर कबीर के भोजपुरी आम जन में प्रतिष्ठित रहली सन. साँच त ई बा कि एहिजा भाषा विज्ञान के कवनो जरूरते नइखे, एहिजा इतिहासे के चरचा ईमानदार चरचा कहाई. हर भोजपुरिया का भीतर अपना राष्ट्रभाषा हिंदी खातिर अशेष सम्मान आ प्यार बाटे. भोजपुरी हमनी के मातृभाषा हटे. हिंदी के मजबूती का नाँव पर भोजपुरी के घवदाह कइल कवनो चल्हाकी के काम ना कहाई.




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