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लालू प्रसाद यादव की बेल पर टिकी सबकी नजरें , हमेशा चर्चाओं में रहे लालू की खल रही है कमी

पटना :-  बात बिहार की करें तो राष्‍ट्रीय जनता दल सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव सत्ता में रहें या विपक्ष में, उनकी प्रासंगिकता बनी रही है। चारा घोटाले (Fodder Scam) के दुमका कोषागार के मामले में उनकी जमानत अर्जी पर अब शनिवार को सुनवाई होगी। शनिवार को उन्‍हें जमानत मिले या नहीं, वे विपक्ष की राजनीति की धुरी बने रहेंगे। फिलहाल लालू चारा घोटाला में जेल की सजा के तहत दिल्‍ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्‍थान में इलाज करा रहे हैं। रांची हाईकोर्ट में उनकी जमानत पर सुनवाई पर सभी की नजरों टिकीं हैं। लालू परिवार और आरजेडी को उनकी जमानत की उम्‍मीद है। विदित हो कि आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के जमानत पर शुक्रवार को रांची हाईकोर्ट में सुनवाई होनी थी, लेकिन कोरोनावायरस संक्रमण पर नियंत्रण के लिए हाईकोर्ट परिसर सैनिटाइजेशन के लिए बंद कर दिया गया है। इस कारण अब उनकी जमानत पर शनिवार (17 अप्रैल) को सुनवाई होगी। रांची हाई कोर्ट में यह मामला जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की अदालत में सूचीबद्ध है, जिसमें सीबीआइ ने जवाब दाखिल कर जमानत का विरोध किया है।

धीरे-धीरे बनाते गए राजनीति में मजबूत जगह

साल 1990 में जब लालू प्रसाद यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने, तब किसी को यह अंदाजा नहीं था कि वे तत्‍कालीन बड़े नेताओं जगन्नाथ मिश्रा, सत्येंद्र नारायण सिंह, भागवत झा आजाद और रामाश्रय प्रसाद सिंह के रहते अपनी मजबूत जगह बना पाएंगे। लेकिन लालू अपनी सूझबूझ से समय के साथ धीरे-धीरे राजनीति के शिखर पर पहुंचने में कामयाब रहे। आज बिहार में राजनीति उनके समर्थन या विरोध के इर्द-गिर्द घूम रही है।

जेल से बाहर निकले तो मजबूत होगा विपक्ष

यह लालू का प्रभाव ही है, जिस कारण वे आज भी सत्‍ता पक्ष के निशाने पर तो विपक्ष की राजनीति के केंद्र में हैं। सत्ता से बाहर रहकर भी वे कांग्रेस व वाम दलों समेत विपक्ष के दलों की राजनीति लालू की कृपा पर ही टिकी रहती है। सवाल यह है कि अगर चारा घोटाला के दुमका कोषागार मामले में उन्‍हें जमानत मिल गई, तब क्‍या होगा? ऐसी स्थिति में आरजेडी को संजीवनी मिलनी तय है। उनका बिहार में रहना ही पार्टी को ताकत देगा। कई तेजस्‍वी यादव के नेतृत्‍व को नहीं स्‍वीकार कर रहे कई विपक्षी दल लालू यादव के नेतृत्‍व में एकजुट हो जाएं तो आर्श्‍चय नहीं।




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